गुफा में ‘लेडी मोगली’ — कर्नाटक की पहाड़ियों से निकली रूसी महिला और उसके दो बच्चों की रहस्यमयी दास्तान
गुफा में ‘लेडी मोगली’ — कर्नाटक की पहाड़ियों से निकली रूसी महिला और उसके दो बच्चों की रहस्यमयी दास्तान
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क्या है पूरा मामला?
कर्नाटक के तटीय नगर गोकर्ण के रामतीर्थ हिल्स की एक गहरी गुफा से 40-वर्षीय रूसी नागरिक नीना कुटिना (स्थानीय साधु‑नाम ‘मोही’) तथा उनकी दो बेटियां—छह वर्षीय प्रेमा और चार वर्षीय आमा—को 11 जुलाई 2025 की रात तलाशी गश्ती के दौरान पुलिस ने खोज निकाला। यह इलाका भूस्खलन और जंगली जानवरों के खतरे के लिए बदनाम है, इसलिए अधिकारियों ने तुरंत बचाव दल बुलाकर परिवार को सुरक्षित बाहर निकाला।
कौन हैं नीना कुटिना उर्फ ‘मोही’?
नीना रूस से 2016 में बिजनेस वीज़ा पर भारत आईं, पर 2017 में वीज़ा खत्म होने के बाद भी लौटकर 2018 में दोबारा आईं और तब से अनधिकृत रूप से ठहरी हुई थीं। आत्म‑खोज और हिंदू दर्शन में गहरी रुचि के चलते उन्होंने जंगल के भीतर बसना चुना। मीडिया ने उन्हें ‘लेडी मोगली’ तक कहा, क्योंकि वे प्रकृति में समरस होकर रहती मिलीं।
कैसे हुआ खुलासा?
गोकर्ण-कुल-क्षेत्र में 9 जुलाई को भारी बारिश ने भूस्खलन का खतरा बढ़ा दिया था। जब पुलिस ने रात में पहाड़ियों की गश्त बढ़ाई, तो उन्हें प्लास्टिक शीट और पथरीली चट्टानों के बीच बना अस्थायी ‘घर’ दिखा। अंदर तीनों मां‑बच्चे मिले। पूछताछ पर नीना ने बताया कि वे झरने में नहाते, वन‑फल खाते और शाम को दीप‑आरती करती थीं। उनका दावा था—“हम मर नहीं रहे थे; हम प्रकृति में जीना पसंद करते हैं।”
स्पिरिचुअल सफ़र या कानून का उल्लंघन?
हालांकि नीना का मकसद आध्यात्मिक शांति पाना था, लेकिन 2017 में वीज़ा समाप्त होने के बाद उनका रुकना विदेशी नागरिक अधिनियम के तहत अपराध है। कर्नाटक पुलिस ने विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (FRRO) को सूचित कर डिपोर्टेशन प्रक्रिया शुरू कर दी है। साथ ही, उन पर पर्यावरण एवं वन क्षेत्र के संरक्षण संबंधी राज्य क़ानूनों के उल्लंघन की धाराएं भी लग सकती हैं।
बच्चों की सुरक्षा और अभिभावक विवाद
बचाव के तुरंत बाद मां‑बच्चों को एक स्थानीय आश्रम में रखा गया, जहां सुविधा सीमित थी। इसी बीच, नीना के इज़राइली पूर्व‑पति बरार गोल्डस्टीन ने बैंगलोर पहुंचकर पुलिस से बच्चों की साझा कस्टडी मांगी। उनका कहना है कि जंगल में रहने से बच्चों की पढ़ाई‑लिखाई और स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ा है। न्यायालय को अब यह तय करना होगा कि बच्चों की सर्वोत्तम हित में कौन‑सी व्यवस्था उचित रहेगी।
स्थानीय समुदाय की प्रतिक्रिया
रामतीर्थ हिल्स के ग्रामीण शुरुआत में दुविधा में थे—एक तरफ ‘विदेशी साध्वी’ की साधना ने जिज्ञासा जगाई, दूसरी ओर अवैध प्रवास और बच्चों की सुरक्षा का प्रश्न था। कुछ श्रद्धालु उन्हें ‘सन्यासी आत्मा’ मानकर मदद देना चाहते हैं, जबकि अन्य का तर्क है कि नियम सबके लिए समान होने चाहिए। पर्यटन विभाग ने गुफा‑इलाके को संवेदनशील क्षेत्र घोषित कर अस्थायी रूप से बंद कर दिया है, ताकि कोई दूसरा साहसी पर्यटक ऐसा कदम न उठाए।
आगे की कानूनी राह
एफआरआरओ दस्तावेज़ों के अनुसार, नीना के खिलाफ Foreigners Act (Section 14) और Passport Act (Section 12) के तहत मामला दर्ज हुआ है। डिपोर्टेशन से पहले उन्हें बेंगलुरु में विदेशी बंदी शिविर भेजा जा सकता है। इस दौरान, बाल कल्याण समिति (CWC) बच्चों की काउंसलिंग और अस्थायी देखभाल सुनिश्चित करेगी।
समाज के लिए सबक और व्यापक संदेश
यह घटना कई बड़े सवाल उठाती है—क्या आध्यात्मिक स्वतंत्रता कानूनों से ऊपर हो सकती है? क्या विदेशी पर्यटक वीज़ा नियमों को हल्के में लेते हैं? साथ ही, बच्चों के अधिकार और सुरक्षा सर्वोपरि हैं। भारतीय वन‑क्षेत्रों में ‘इको‑टूरिज़्म’ का चलन बढ़ रहा है, पर यह केस बताता है कि पर्यावरण, क़ानून और मानवाधिकार—तीनों का संतुलन अनिवार्य है।
निष्कर्ष
रामतीर्थ हिल्स की गुफा से शुरू हुई इस ‘लेडी मोगली’ कथा ने भारत‑रूस संबंधों से लेकर वन‑संरक्षण नीति तक को सुर्खियों में ला दिया है। जैसे‑जैसे कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, यह देखना रोचक होगा कि आध्यात्मिकता और व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है। लेकिन एक बात निश्चित है—कानून का सम्मान और बच्चों की भलाई किसी भी सैर‑सपाटे या साधना से बड़ा मुद्दा रहेगा।

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